आजादी के पेड़ को लगातार सींचने से ही
राष्ट् का उत्थान संभव
क्या यह देश उन्हीं का है, जो युद्धों में मर जाते हैं,
अपना खून बहाकर टीका सरहद पर कर जाते हैं,
ऐसा युद्ध वतन की खातिर सबको लड़ना पड़ता है
संकट की घड़ियों में सबको सैनिक बनना पड़ता है।
जो भी कौम वतन की खातिर, मिटने को तैयार नहीं,
उनकी संतति को आजादी जीने का अधिकार नहीं।
कवि के यह उद्गार इस सत्य का उद्घाटन कर रहे हैं कि यदि हम अपने कर्तव्यबोध रूपी जल से आजादी के पेड़ को सींचने का संकल्प निभा रहे हैं, तो वर्तमान समय की विसंगतियों एवं नकारात्मक स्थिति से देश को निश्चित ही बचाने में सक्षम हो जाएंगे। यह सवाल वर्तमान में बहुत प्रासंगिक है कि हम जितने सजग व सतर्क अपने अधिकारों के प्रति हैं, उतने क्या अपने कर्तव्यों के प्रति भी हैंॽ यदि हमें सड़क पर चलने का अधिकार मिला है, तो ट्रैफिक नियमों के पालन का कर्तव्य भी तो मिला है। यदि हमें साफ पानी की आवश्यकता है, तो जल प्रदूषण रोकना हमारी जिम्मेदारी भी तो है। यदि हमें स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छ वातावरण चाहिए, तो पर्यावरण सुरक्षा का दायित्व स्वीकार भी तो करना पड़ेगा। यदि हमें अभिव्यक्ति की आजादी मिल गई है, तो हमारे शाश्वत संस्कारों से युक्त मर्यादित भाषा का प्रयोग करना हमारा ही नैतिक कर्तव्य होगा। इस प्रकार के कर्तव्य बोध को स्वीकार करके ही हम यह आत्म संतुष्टि अनुभव करेंगे कि हमने भी देश के प्रति अपना कर्तव्य पालन किया है। आजादी के नायकों को यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि भी यही होगी। नारे लगाने मात्र से ही हम देशभक्त नहीं हो जाएंगे ,अपितु प्रत्येक परिस्थिति में उत्तम चरित्र, ईमानदारी, निष्ठा, सजगता परोपकार आदि मानवीय गुणों का तत्परतापूर्वक पालन करने से ही व देश- सेवा की भावना को अपने जीवन में उतार कर ही सच्चे अर्थों में हम देश के प्रति अपना फर्ज निभा पाएंगे।
इस प्रकार के तमाम कर्तव्य बोध हम अपने विद्यालयी उत्सवों में, विभिन्न कार्यक्रमों में अपने विद्यार्थियों तक संप्रेषित कर रहे हैं और कवि की इन भावनाओं के साथ जीने का प्रयास कर रहे हैं-
आहुति बाकी, यज्ञ अधूरा, अभी बहुत बाकी है मंजिल।
लिए संगठित सोच चल रहे, हम सब आपस में है हिलमिल।
जय हिंद
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