Friday, September 18, 2026

 केवल सफलता नहीं हर परिस्थिति में चरित्र आवश्यक:

वर्तमान युग की जिन विसंगतियों ,विकृतियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण विकृति की तरफ ध्यान आकर्षित किया जाए तो यह विषय उभर कर आता है कि वर्तमान की अधिकांश समस्याओं की जड़ चारित्रिक हीनता  से प्रारंभ होती है।

एक बहुत ही प्रेरक विचार है- बेईमानी की जीत से ईमानदारी की हार हजारों गुना बेहतर है। साधनों की पवित्रता के बिना मिला हुआ लक्ष्य कोरी सफलता तो ले आता है लेकिन वह हमें पूर्ण संतुष्टि प्रदान नहीं कर सकता एवं न हीं  वह समाज एवं राष्ट्र के लिए उपयोगी सिद्ध होता है। सफलता की अंधी दौड़ मैं दौड़ती हुई नई पीढ़ी को यह ज्ञान कराना बेहद आवश्यक है कि अपने व्यक्तित्व में

यदि चारित्रिक दृढ़ता नहीं है तो कितना ही यश हो,  समृद्धि हो सब तिनके के समान बह जाते हैं।

संस्कृत भाषा में चरित्र शब्द की उत्पत्ति 'चर' धातु से हुई है जिसका अर्थ चलना किसी कार्य को करना या आचरण से संबंधित है,अर्थात चरित्र से तात्पर्य मनुष्य के उच्च नैतिक आचरण, सदाचार एवं माननीय सिद्धांतों से है। चरित्र बाहरी दिखावे का नहीं आंतरिक गुणों और मूल्यों की एक झांकी प्रस्तुत करता है। प्रायोगिक रूप से इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि इसके सशक्त होने पर ही व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी सही- गलत के बीच निर्णय कर पाता है। कहां जाता है कि चरित्रवान प्राणी जिस स्थिति में भी हो अपना जीवन बना लेता है वह निष्ठा के साथ परिश्रम करता हुआ धीरे-धीरे प्रगति करता है। वह पीछे मुड़कर नहीं देखता आगे देखकर साहसपूर्वक अग्रसर होता है। भारतीय संस्कृति कर्म सिद्धांत पर आधारित है। श्रीमद् भागवत गीता में भी यह तथ्य स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है स्वयं अपना शत्रु भी है। मनुष्य को चाहिए की उत्तम मानवीय गुणों को अपनी जीवन यात्रा में संपूर्ण रूप से सम्मिलित कर अपने जीवन को श्रेष्ठ आधार प्रदान करे। ऐसा करने पर ही मनुष्य जीवन की सार्थकता भी है एवं स्वयं, परिवार, समाज एवं राष्ट्र का हित संवर्धन भी है।

हमारे विद्यालय में अध्ययन के साथ विभिन्न कार्यक्रमों उत्सवों एवं गतिविधियों में बच्चों को चरित्रवान बनने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस विवेचना में कवि के शब्द भी सार्थक सिद्ध हो रहे हैं-

अपना जमीर बेचकर दौलत मिली तो क्या, 

अपनी नजर में अपनी ही इज्जत नहीं रहती।

 केवल सफलता नहीं हर परिस्थिति में चरित्र आवश्यक: वर्तमान युग की जिन विसंगतियों ,विकृतियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण विकृति की तरफ ध्यान आकर्षि...